: सीता राम चरण रति मोरे, अनुदिन बढ़त अनुग्रह तोरे....राजन जी महाराज
Admin Sat, Sep 9, 2023
भगवान के राजतिलक की कथा सुनकर भाव विभोर हुए श्रद्धालु
प्रसिद्ध धर्मिक स्थल तालेश्वर पर अम्बरीष शर्मा गुड्डू भैया द्वारा आयोजित कथा में राजतिलक की कथा पर बोले पूज्य राजन जी महाराज
हजारों श्रद्धालुओं ने पहुँचकर किया भण्डारा प्रसाद ग्रहण
लहार भिंड - संवाददाता
नगर के प्रसिद्ध धार्मिक स्थल तालेश्वर सरकार पर प्रदेश कार्यसमिति सदस्य अम्बरीष शर्मा गुड्डू भैया द्वारा आयोजित राम कथा के नौवें दिन पूज्य कथा वाचक राजन जी महाराज ने कहा कि जब सुग्रीव ने राम और लक्ष्मण को देखा तो वह भयभीत हो गया। इतने बलशाली और तेजस्वीवान मनुष्य उसने कभी नहीं देखे थे। वह भागते हुए हनुमान के पास गया और कहने लगा कि हमारी जान को खतरा है। सुग्रीव को लग रहा था कि कहीं यह बाली के भेजे हुए तो नहीं हैं सुग्रीव ने हनुमानजी से कहा कि तुम ब्रह्मचारी का रूप धारण करके उनके समक्ष जाओ और उसके हृदय की बात जानकर मुझे इशारे से बताओ। यदि वे सुग्रीव के भेजे हुए हैं तो मैं तुरंत ही यहां से कहीं ओर भाग जाऊंगा श्रीरामचंद्रजी ने कहा- हम कोसलराज दशरथजी के पुत्र हैं और पिता का वचन मानकर वन आए हैं। हमारे राम-लक्ष्मण नाम हैं, हम दोनों भाई हैं। हमारे साथ सुंदर सुकुमारी स्त्री थी। यहां (वन में) राक्षस ने मेरी पत्नी जानकी को हर लिया। हे ब्राह्मण! हम उसे ही खोजते फिरते हैं। हमने तो अपना चरित्र कह सुनाया। अब हे ब्राह्मण! आप अपनी कथा कहिए, आप कौन हैं

प्रभु को पहचानकर हनुमानजी उनके चरण पकड़कर पृथ्वी पर गिर पड़े। उन्होंने साष्टांग दंडवत प्रणाम कर स्तुति की। अपने नाथ को पहचान लेने से हृदय में हर्ष हो रहा है। फिर हनुमानजी ने कहा- हे स्वामी! मैंने जो पूछा वह मेरा पूछना तो न्याय था, वर्षों के बाद आपको देखा, वह भी तपस्वी के वेष में और मेरी वानरी बुद्धि… इससे मैं तो आपको पहचान न सका और अपनी परिस्थिति के अनुसार मैंने आपसे पूछा, परंतु आप मनुष्य की तरह कैसे पूछ रहे हैं? मैं तो आपकी माया के वश भूला फिरता हूं। इसी से मैंने अपने स्वामी (आप) को नहीं पहचाना, किंतु आप तो अंतरयामी हैं जब हनुमान पहुंचे तो महावीर हनुमान ने मानो अणिमा सिद्धि का प्रयोग कर स्वयं को छोटा सा रूप बना लिया और भगवान का स्मरण करते हुवे लंका के द्वार पर पहुंच गए लंका नगर की अधिष्ठाती देवी लंकिनी शाम को हनुमानजी को छिपते हुवे उन्हें प्रवेश करते देखा वह हनुमान के पास आयी और उसे चेतावनी दी, क्या तुम चोरी करना चाहते हो? ” हनुमान ने उसे पीठ पर दे मारा, वह लहू लुहान होकर ज़मीं पर गिर पड़ी उसने खुद को संभाला और कहा – “हे देव , अब मैं आपको जान गई हु। ब्रह्मा ने मुझे पहले ही बता दिया था, कि जब आप वानर की पिटाई के कारण ऐसी अवस्था में होते हैं, तो मान लेना कि रावण का अंत आ गया है लंकिनी ने रास्ता दिया हनुमान अंदर दाखिल हुए उसने लंका में प्रवेश किया आगे बढ़ते हुए उन्होंने एक छोटी कुटिया देखी। राम का नाम कुटीर की दीवार पर अंकित था, जो रत्नों की चमक के कारण स्पष्ट दिखाई दे रहा था छोटे छोटे धाराओं के बीच तुलसी के पौधे, केसर और सुगंधित फूल थे। भगवान का एक छोटा सा मंदिर था, जो पत्ती की कुटीर के सामने भगवान के शाश्त्र से बने चित्रों के साथ था। हनुमान को लंका में बहुत आश्चर्य हुआ वे उत्साहित थे यह ब्रह्ममुहूर्त का समय था विभीषण उठे, और “राम राम” का जाप करने लगे हनुमान को विश्वास हुवा कि यह एक संत पुरुष है हनुमानजी विभीषण का परिचय लेने के लिए उत्सुक हुए हनुमान ने ब्राह्मण का रूप धारण किया और ‘राम राम’ का उच्चारण किया विभीषण तुरंत बाहर आ गए। भगवान के दो भक्त एक-दूसरे से मिले उनके हृदय प्रेम और आनंद से भर गए हनुमान ने विभीषण के ह्रदय में साक्षात भगवान को देखा, और विभीषण हनुमान को साक्षात भगवान के रूप में मानने लगे। दोनों में पहचान हुई। हनुमान ने उन्हें अपने दयालु भगवान के पवित्र चरित्र और सीताहरण की घटना को सुनाते हुए, उनके आने का कारण बताया विभीषण ने कहा – “प्रिय हनुमान! मैं यहां इस तरह से परेशानी में रहता हु, जैसे जीभ दांतों के बीच रहती है। क्या प्रभु कभी मुझ अनाथ को अपनाएंगे? मेरी जाति तमोगुणी है। मेरे पास भक्ति का कोई साधन नहीं है पहले मैं यह सोचता था ,के अगर ईश्वर के चरणों में प्रेम नहीं है, तो मैं ईश्वर को पाने की आशा कैसे कर सकता हूं? लेकिन अब तुम्हें देखकर मेरा मन भर रहा है; क्योंकि भगवान की कृपा के बिना, उनके अनुग्रह संत प्रकट नहीं होते हैं। भगवान की कृपा से आप घर आए हैं और मुझे दर्शन दिए हैं। इतना तो तय है कि संतदर्शन ईश्वर से मिलने की निशानी है हनुमान ने कहा – विभीषण ! हमारे प्रभु बहुत दयालु है। वे हमेशा अपने भक्त के प्रति दयालु रहते हैं। आप अपने लिए बोलते हैं, लेकिन मैं कहाँ से हूँ? मैं तो एक साधारण वानर हूँ, चंचल और असहाय! अगर कोई प्रातःकाल मेरा नाम भी लेता है, तो उसे पूरे दिन भोजन नहीं मिलता सखा विभीषण ! भले ही मैं इतना अधम हूँ, पर फिरभी प्रभु की मुझ पर असीम कृपा रही है। जो लोग भगवन को दयालु जानकर भी उनकी पूजा नहीं करते, वह संसार में भटकते रहते है, वे दुखी क्यों न हो? ” भगवान के अपार गुणों को याद करते हुए, हनुमान का हृदय गद-गद हो रहा था उनकी आँखों में अश्रुओ की धारा बहने लगी। विभीषण और हनुमान के बीच काफी बातें हुईं।

फिर विभीषण ने माता सीता के बारे में बताते हुवे उनको अशोक वाटिका भेजा रावण के पुत्र अक्षय कुमार का वध जब यह खबर लंकापति रावण के पास पहुंची, तब उन्होंने अपने बहुत से योद्धाओं को उस वानर का वध करने के लिए भेजा. लेकिन हनुमान जी ने सभी योद्धाओं को बहुत ही आसानी से मार डाला और कुछ को घायल कर दिया. यह सब सुनते हुए रावण बहुत ही क्रोधित हुआ और उसने अपने पुत्र अक्षय कुमार को हनुमान का वध करने के लिए भेजा, किन्तु हनुमान जी ने उनके पुत्र अक्षय कुमार को भी नहीं छोड़ा और उसका वध कर दिया रावण अपने पुत्र के वध की सूचना सुनते हुए और भी अधिक क्रोधित हुआ और उसने अपने दुसरे पुत्र इंद्रजीत को उस वानर को जिन्दा पकड़ कर सभा में लाने का आदेश दिया. हनुमान जी ने इन्द्रजीत को देखा तो वे समझ गए कि इस बार बहुत ही भयंकर योद्धा आया है वे उनसे युद्ध करने लगे. हनुमान जी ने एक पेड़ उखाड़ कर उनकी तरफ फेंका और वे कुछ समय के लिए बेहोश हो गए, फिर होश में आते ही उन्होंने हनुमान से युद्ध जारी रखा और अपनी कई माया रचने लगे किन्तु हनुमान सब से बचते हुए उनसे युद्ध करते रहे इसके बाद इन्द्रजीत ने ब्रम्हास्त्र का प्रयोग किया, तब यह देख कर हनुमान जी ने सोचा कि वे इसका सामना नहीं कर पाएंगे, तब उन्हें ब्रम्हास्त्र लगते ही वे पेड़ से नीचे गिर गए. इन्द्रजीत ने हनुमान को नागपाश शक्ति से बांध दिया हनुमान को सभा में लाने के बाद उनकी मुलाकात रावण से हुई. रावण को देखकर हनुमान ने उसे बहुत ही अपशब्द कहें और वे हँस पड़े. यह देखकर रावण को गुस्सा आया और उसने हनुमान से कहा कि तुम कौन हो, तुम्हेँ अपनी मृत्यु से डर नहीं लगता और तुझे यहाँ किसने भेजा है? तब हनुमान जी ने उससे कहा मुझे उन्होंने भेजा है, जो इस सृष्टि के पालन कर्ता हैं, जिन्होंने शिवजी के महान धनुष को तोड़ा, जिन्होंने बालि जैसे महान योद्धा का वध किया और जिनकी पत्नी का तुमने छल पूर्वक हरण किया है रावण ने कहा इस बानर को मार डालो तो रावण के भाई विभीषण ने उन्हें रोकते हुए रावण से कहा कि – यह दूत है और किसी दूत को सभा में मार डालना नियमों के खिलाफ है. रावण ने उन्हें रोका और सभी से पूछा कि इसे क्या सजा दी जाये. उनमें से एक योद्धा में कहा कि – वानरों को अपनी पूँछ बहुत प्यारी होता है क्यों ना इसकी पूँछ में कपड़ा लपेट कर तेल डालकर आग लगा दी जाए. रावण ने हनुमान की पूँछ पर आग लगाने का आदेश दिया. हनुमान की पूँछ पर कपड़ा लपेटा जाने लगा किन्तु उनकी पूँछ लम्बी होती चली गई, राज्य का सारा तेल और कपड़ा उनकी पूँछ में ही लग गया. फिर जैसे तैसे उनकी पूँछ में आग लगा दी और उन्हें छोड़ दिया. हनुमान जी की पूँछ में आग लगते ही उन्होंने एक महल से दुसरे महल कूदते हुए पूरी लंका में आग लगा दी. सिर्फ एक विभिषण का महल छोड़ कर उन्होंने पूरी लंका को जला डाला. जिससे पूरा नगर जल कर राख हो गया. फिर उन्होंने समुद्र में जा अपनी पूँछ की आग बुझाई और वापस लौट गए. इस तरह लंका दहन की कहानी समाप्त हो गई विभीषण ने बताया मारने का तरीका पौराणिक कथा के अनुसार रावण परम ज्ञानी और शक्तिशाली था. श्री राम के लिए उसे मारना बहुत मुश्किल था. विभीषण ने राम को लंकेश को मारने का तरीका बताया था. बताया था कि रावण को एक विशेष अस्त्र से नाभि पर प्रहार करके मारा जा सकता है. रावण को मारने के लिए दिव्यास्त्र का इस्तेमाल किया गया था. विभीषण ने श्रीराम को इस अस्त्र के बारे में बताया था, शास्त्रों के अनुसार ये अस्त्र ब्रह्मा ने दशानन को दिया था. इस अस्त्र को पाने के लिए हनुमान वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण कर मंदोदरी के कक्ष में पहुंच गए थे रामायण के अनुसार प्रभु राम और रावण के बीच भंयकर युद्ध हुआ था. इस युद्ध के बाद भगवान राम ने युद्ध में सफलता हासिल हुई थी आजकी कथा में पूर्व बिद्यायक मथुरा प्रसाद जी महंत,श्री श्री 1008 खड़ेश्वरी महाराज साधू सन्तो के साथ भक्तों का समागम हुआ मौके पर कथा यजमाम श्रीमति अरुणा नरेश शर्मा ने कथा अमृत पान करने के उपरांत भण्डारा प्रसादी ग्रहण कर अबश्य जाएं एवम पुण्य लाभ प्राप्त कर अपने जीवन को सफल बनायें ।


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